TODAY ARTICLE: बाजार में आग और जख्मों पर नमक!

✍️आलेख : संजय पराते
बाजार में महंगाई की आग लगी है। रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। प्याज, शक्कर, गुड़, चावल, मक्के का आटा और पशु आहार—सबकी कीमतों में उछाल ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। त्योहारी सीजन में बढ़ती कीमतों ने जनता की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
सवाल यह है कि क्या इस महंगाई के पीछे केवल जमाखोरी और कालाबाजारी है? या फिर सरकार की नीतियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं?
लेखक के अनुसार, सरकार ने शक्कर कारोबारियों पर स्टॉक सीमा जैसी कार्रवाई तो की है, लेकिन महंगाई की जड़ में मौजूद नीतिगत कारणों की समीक्षा से बच रही है। पेट्रोल की कीमतों से लेकर इथेनॉल नीति, खाद्यान्न बाजार और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था तक—इन सभी का असर आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है।

पेट्रोल की कीमतों का असर सीधे परिवहन लागत पर पड़ता है और परिवहन महंगा होने का मतलब है कि लगभग हर वस्तु की कीमत पर दबाव बढ़ना। वहीं, इथेनॉल उत्पादन में गन्ने और मक्के जैसे कृषि उत्पादों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। लेखक का तर्क है कि खाद्यान्नों का इस्तेमाल ईंधन उत्पादन में बढ़ने से भविष्य में खाद्यान्न उपलब्धता और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
दूसरी ओर, खाद्यान्न बाजार में सट्टेबाजी और जमाखोरी की आशंका भी महंगाई को बढ़ा सकती है। यदि बाजार में तत्काल कमी नहीं है, फिर भी कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, तो सरकार को केवल स्टॉक सीमा लगाने के बजाय पूरे आपूर्ति तंत्र की निगरानी करनी चाहिए।
महंगाई का सबसे बड़ा असर गरीब और मेहनतकश परिवारों पर पड़ता है। चाय इसका एक छोटा लेकिन बेहद आम उदाहरण है। शक्कर, चायपत्ती, अदरक, इलायची और दूध—हर चीज महंगी होने से वह चाय, जो कभी मेहनतकशों के लिए सस्ती राहत हुआ करती थी, अब उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ बनती जा रही है।
ऐसे समय में मध्यप्रदेश के संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का शक्कर को लेकर दिया गया कथित बयान विवाद का विषय बना है। लेखक इसे आम जनता की परेशानी के प्रति संवेदनहीन टिप्पणी मानते हैं। सवाल यह है कि जब करोड़ों परिवार महंगाई से परेशान हों, तब जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से क्या अधिक संवेदनशील और जवाबदेह व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए?
किसी मंत्री को व्यक्तिगत पसंद-नापसंद रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन सरकार में जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति की सार्वजनिक टिप्पणी का राजनीतिक अर्थ भी निकाला जाता है। इसलिए महंगाई जैसे गंभीर मुद्दे पर मजाक या चुटकी जनता की पीड़ा को और गहरा कर सकती है।
लेखक का आरोप है कि पिछले वर्षों में महंगाई कम करने और किसानों की आय बढ़ाने के वादों के विपरीत आम लोगों की क्रय शक्ति पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता बाजार को नियंत्रित करना, जमाखोरी पर रोक लगाना और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को आम आदमी की पहुंच में रखना होना चाहिए।
जनता को महंगाई से राहत चाहिए, तंज नहीं। रसोई में लगी आग पर भाषण नहीं, ठोस नीति चाहिए। सरकार यदि वास्तव में आम आदमी के साथ खड़ी है, तो उसे महंगाई के कारणों पर ईमानदारी से विचार करना होगा। वरना बढ़ती कीमतों के बीच नेताओं के बयान जनता के जख्मों पर नमक का काम ही करेंगे।

(✍️लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)




