राजनीतिक अगर भ्रष्ट हो चुकी हो तो,न्यायापालिका से लेकर कार्यपालिका और पत्रकारिता को भी दूषित करेगी।।

राजनीतिक अगर भ्रष्ट हो चुकी हो तो,न्यायापालिका से लेकर कार्यपालिका और पत्रकारिता को भी दूषित करेगी।।
इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण वर्तमान राजनीति माहौल में देखने को मिल रहा है। केंद्रीय सत्ता के तुगलकी निर्णयों का विरोध करने का साहस किसी व्यक्ति और राजनीतिक दल यहां तक की न्यायिक संस्थाओं में भी नहीं बच पाती है।

सबसे बड़ी बात इन हालातों में ज्यादातर आम लोग भी सत्ता के हर सही गलत निर्णय को या तो अपनी नियति मान लेते है या फिर राष्ट्रवाद के स्वरूप में देखने लगते हैं।
देश की वर्तमान परिस्थितियां इसी दौर से गुजर रही है। यहां दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की निष्पक्ष न्यायपालिका ने केंद्रीय सत्ता की गुलामी स्वीकार कर ली है। 90 प्रतिशत से अधिक मीडिया संस्थानों को केंद्रीय सत्ता से संरक्षण प्राप्त बेईमान उद्योगपतियों और कारोबारियों ने खरीद लिया है।

बुनियादी जरूरतों से महरूम देश के ज्यादातर आम नागरिको को बेहिसाब सरकारी टैक्स पटाने और परिवार की जरूरतों को पूरा करने से फुर्सत नहीं हैं। ऐसे में महंगाई,बेरोजगारी,पलायन,भ्रष्टाचार,लगातार बिगड़ती समाजिक आर्थिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों पर चर्चा करे भी तो कौन करे?? जिन्होंने भी आवाज उठाने का साहस किया उसे आज के राष्ट्रवादियों ने पहले तो पाकिस्तानी फिर देश का गद्दार और अंत में नक्सली नाम धरा दिया,और फिर उन साहसी लोगों के खिलाफ बचा खुचा कसर देश की लट्ठधारी पुलिस और सत्ता के आगे नतमस्तक न्यायधीशों ने पूरा कर दिया।

इन सबके बीच बस एक उम्मीद बाकी है,जो कहती है कि जब अच्छे सुकून भरे दिन आज नहीं रहे,तो ये दुख और नफरत से भरे हालात भी ज्यादा दिन तक नहीं रहेंगे।। आज नहीं तो कल उम्मीदों से भरी वो सुबह भी आएगी।

नितिन सिन्हा…✍️
सम्पादक
खबर सार



