Latest Newsलेख

🚨🎯LATEST ARTICLE:🔥🔥🎯 औद्योगिक रायगढ़ की सड़कों पर बंदरों की दस्तक : विकास की कीमत या सभ्यता की विफलता? फैक्ट्रियों के काले धुएं का कहर,,आसान नहीं है जिला मुख्यालय की डगर!!पढ़िए खबर!🔥🔥🎯🚨

रायगढ़।✍️ औद्योगिक जिला रायगढ़ की सड़कों पर इन दिनों बंदरों के झुंड दिखाई देना कोई सामान्य दृश्य नहीं रह गया है। चौराहों, बाजारों, कॉलोनियों और फैक्ट्रियों के आसपास भोजन की तलाश में भटकते वानर हमें बार-बार एक असहज सच्चाई से रूबरू कराते हैं — यह उनकी आदतों में आया बदलाव नहीं, बल्कि हमारे तथाकथित विकास की देन है।

कभी जिन जंगलों में ये प्राणी निर्भय होकर रहते थे, आज वही जंगल उद्योगों, खदानों और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुके हैं। पेड़ों की कटाई के साथ उनके भोजन के प्राकृतिक स्रोत भी खत्म हो गए। फल, कंद, जड़ें और पत्ते — जो कभी उनका अधिकार थे — अब स्मृति बन चुके हैं। जब जंगल उजड़ते हैं, तो भूख शहरों की ओर निकल पड़ती है।

आज बंदर सड़कों पर इसलिए नहीं हैं कि उन्हें शहर पसंद है, बल्कि इसलिए कि उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा। कभी राह चलते कोई संवेदनशील नागरिक उन्हें दाना या फल दे देता है, लेकिन क्या यह स्थायी समाधान है? यह करुणा नहीं, बल्कि हमारे विकास मॉडल की असफलता का तात्कालिक मरहम है। फाइल फोटो…👇👇

रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिलों में जहां बड़े-बड़े संयंत्र, कोयला खदानें और स्टील प्लांट विकास की पहचान बने हुए हैं, वहीं इनके पीछे छूटती जा रही हरियाली किसी सरकारी रिपोर्ट में दिखाई नहीं देती। पर्यावरणीय स्वीकृति कागजों में मिल जाती है, पर जंगलों की आत्मा किसी फाइल में दर्ज नहीं होती।

बंदरों का सड़क पर उतरना केवल वन्यजीव समस्या नहीं है, यह सामाजिक चेतावनी है। यह हमें बताता है कि हमने प्रकृति से उसका हिस्सा छीना है। हमने विकास को इतना एकतरफा बना दिया कि उसमें सहअस्तित्व की कोई जगह नहीं बची।

यह दृश्य दया का नहीं, आत्ममंथन का विषय है। यह प्रश्न उठाता है कि क्या हम सचमुच सभ्य समाज हैं? क्या हमारी प्रगति इतनी निर्दयी हो चुकी है कि उसमें प्रकृति के लिए कोई जगह नहीं?

आज अगर बंदर सड़कों पर हैं, तो कल और भी जीव होंगे। और परसों शायद हम स्वयं अपनी ही बनाई दुनिया में शरणार्थी बन जाएँ।

विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो जंगलों की कीमत पर खड़ा हो, वह सभ्यता नहीं, विनाश की बुनियाद है। रायगढ़ की सड़कों पर भटकते वानर हमें यही याद दिला रहे हैं —
“#यह उनकी आदत नहीं बदली है, हमने उनका घर बदला है।”

Aslam Khan

मेरा नाम असलम खान है, मैं MaandPravah.com का संपादक हूँ। इस पोर्टल पर आप छत्तीसगढ़ सहित देश विदेश की ख़बरों को पढ़ सकते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button