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🔥📢✍️LATEST ARTICLE:📢🐘 पुरंगा कोल ब्लॉक: हाथियों के रास्ते में खनन की घुसपैठ, जंगल पर ‘काग़ज़ी विकास’ का हमला….🌳🐘🌳🐘🌳🐘🌳🐘⚫🌑⚫🌑⚫🌑⚫

✍️विशेष रिपोर्ट,,धरमजयगढ़ /छत्तीसगढ़: धरमजयगढ़ वनमंडल अंतर्गत पुरंगा कोल ब्लॉक में प्रस्तावित भूमिगत कोयला खनन परियोजना अब केवल एक औद्योगिक योजना नहीं रही, बल्कि यह वन्यजीव संरक्षण बनाम कॉर्पोरेट–प्रशासनिक गठजोड़ की खुली परीक्षा बन चुकी है। 621.331 हेक्टेयर में फैली यह परियोजना उस भूभाग पर लाई जा रही है, जो हाथियों के प्राकृतिक आवागमन तंत्र का अभिन्न हिस्सा रहा है। फाइल फोटो…..👇👇

👉दस्तावेज़ मानते हैं सच, फिर भी आँख मूँदकर आगे बढ़ रही फाइलें…..

परियोजना से जुड़े आधिकारिक काग़ज़ात खुद स्वीकार करते हैं कि खनन क्षेत्र से महज़ 9 किलोमीटर की दूरी पर एक प्रमुख हाथी गलियारा मौजूद है। यही गलियारा वर्ष 2023 की आधिकारिक वन्यजीव अनुसंधान रिपोर्ट में देश के महत्वपूर्ण हाथी कॉरिडोरों में दर्ज है।
इसके बावजूद यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि 10 किलोमीटर की परिधि में कोई अधिसूचित अभयारण्य नहीं है।

👉सवाल सीधा है—
क्या 🐘हाथी केवल अधिसूचना जारी होने के बाद ही गलियारे का उपयोग करते हैं?
क्या जंगल को चलने के लिए सरकारी गजट का इंतज़ार करना चाहिए?

👉अधिसूचना नहीं तो संरक्षण भी नहीं? यह कैसा वन कानून है….!

हाथी गलियारे का औपचारिक अधिसूचित न होना अब इस परियोजना का सबसे बड़ा ढाल और बहाना बना दिया गया है। जबकि वन्यजीव विशेषज्ञ संस्थान, वैज्ञानिक अध्ययन और फील्ड रिपोर्टें इस मार्ग की स्पष्ट पहचान और उपयोग की पुष्टि कर चुकी हैं।

यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि कानूनी शब्दजाल के पीछे जंगल की सच्चाई को कुचलने की कोशिश की जा रही है।

👉खनन का कंपन, हाथियों की बेचैनी और संघर्ष का विस्फोट

👉भूमिगत खनन कोई शांत गतिविधि नहीं होती।

👉लगातार कंपन

👉भारी मशीनों का शोर

👉भूगर्भीय अस्थिरता

👉और मानवीय आवाजाही का अतिक्रमण

ये सभी तत्व हाथियों की संवेदनशील प्रकृति को सीधे प्रभावित करते हैं। परिणामस्वरूप हाथी अपने पारंपरिक मार्ग छोड़कर गाँवों, खेतों और बस्तियों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ टकराव तय है। यह वही इलाका है जो पहले से ही मानव–हाथी संघर्ष का हॉटस्पॉट रहा है। फाइल फोटो…..👇👇

सवाल यह नहीं कि संघर्ष होगा या नहीं,
सवाल यह है कि कितनी जानें इसकी कीमत चुकाएँगी?

👉विकास या विनाश? सरकार के दोहरे मापदंड उजागर….

सरकारी मंचों से सतत विकास, जैव विविधता संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन ज़मीन पर तस्वीर कुछ और ही कहती है—
हाथियों के रास्ते में खनन, जंगल के भीतर मशीनें और भविष्य की बलि।

यह परियोजना साबित करती है कि विकास का अर्थ अब पेड़ों, जानवरों और आदिवासी भूगोल की क़ीमत पर तय किया जा रहा है।

👉🌳🌳अब निर्णायक मोड़ पर है जंगल की लड़ाई….

👉पुरंगा कोल ब्लॉक केवल एक खनन क्षेत्र नहीं, बल्कि यह सवाल है—
❓ क्या जंगल की चेतावनी फाइलों में दबी रहेगी?
❓ या हाथियों का अस्तित्व काग़ज़ी प्रावधानों से ऊपर माना जाएगा?

अब निगाहें उन विभागों पर टिकी हैं, जिनके हस्ताक्षर तय करेंगे कि यह इलाका जंगल रहेगा या खदान में बदल जाएगा।
इस बार फैसला केवल परियोजना का नहीं, बल्कि नीतियों, नीयत और नैतिकता का है।।

Aslam Khan

मेरा नाम असलम खान है, मैं MaandPravah.com का संपादक हूँ। इस पोर्टल पर आप छत्तीसगढ़ सहित देश विदेश की ख़बरों को पढ़ सकते हैं।

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